राजीव रंजन
भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में छठ महापर्व का अपना विशिष्ट स्थान है। लोक आस्था, पवित्रता, अनुशासन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा देश-विदेश में बसे भारतीय समुदायों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना का अनुपम उदाहरण है।
छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, परिवार, समाज और आत्मशुद्धि से जुड़ी एक महान सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें स्वच्छता, संयम, सात्विकता और सामूहिक सहभागिता का विशेष महत्व है।
चार दिनों की पूजा और विधि-विधान
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती स्नान कर घर एवं पूजा स्थल की साफ-सफाई करते हैं। शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। परंपरानुसार अरवा चावल, चना दाल और लौकी की सब्जी जैसे सात्विक भोजन ग्रहण किए जाते हैं। इसके साथ ही घर में पवित्र वातावरण बनाया जाता है और पर्व की तैयारियां प्रारंभ होती हैं।
दूसरा दिन: खरना
छठ का दूसरा दिन खरना कहलाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और संध्या के समय भगवान सूर्य एवं छठी मैया की पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। परंपरागत रूप से गुड़ की खीर, रोटी और अन्य सात्विक प्रसाद तैयार किए जाते हैं। खरना के बाद व्रती लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ करते हैं। इस दौरान श्रद्धा, संयम और मानसिक दृढ़ता का विशेष महत्व होता है।
तीसरा दिन: अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य
महापर्व का तीसरा दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन व्रती नदी, तालाब, पोखर या अन्य जलाशयों के किनारे पहुंचकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। बांस के सूप और डलिया में ठेकुआ, फल, नारियल, ईख तथा अन्य पूजन सामग्री सजाई जाती है।
संध्या के समय जल में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। घाटों पर दीपों की रोशनी, छठी मैया के गीत और श्रद्धालुओं की आस्था से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। यह दृश्य भारतीय लोक संस्कृति की सुंदरता और सामूहिक एकता का अद्भुत परिचय देता है।
चौथा दिन: उदीयमान सूर्य को अर्घ्य
छठ महापर्व के अंतिम दिन प्रातःकाल व्रती एवं श्रद्धालु घाटों पर पहुंचते हैं। उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, संतान की उन्नति और समाज के कल्याण की कामना की जाती है।
उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छठ महापर्व का समापन होता है। इसके बाद व्रती पारण करते हैं और परिवार तथा समाज के बीच प्रसाद वितरण किया जाता है।
छठ के प्रमुख नियम और परंपराएं
छठ महापर्व में शुद्धता और अनुशासन को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार:
- पूजा स्थल, घर और घाट की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।
- प्रसाद निर्माण में शुद्धता एवं सात्विकता का पालन किया जाता है।
- पूजा सामग्री और प्रसाद को स्वच्छ स्थान पर रखा जाता है।
- व्रती श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं।
- छठ के पारंपरिक गीतों के माध्यम से लोक संस्कृति एवं पारिवारिक परंपराओं को जीवंत रखा जाता है।
- पूजा के दौरान प्रकृति, जल और सूर्य के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
- घाटों पर स्वच्छता, सुरक्षा और सामाजिक सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है।
प्रकृति और मानव जीवन का अनूठा संदेश
छठ महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति के प्रत्यक्ष स्वरूप सूर्यदेव की आराधना की जाती है। सूर्य जीवन, ऊर्जा और प्रकाश का आधार हैं। जलाशयों के किनारे पूजा करना जल और पर्यावरण के महत्व को भी रेखांकित करता है।
यह पर्व हमें संदेश देता है कि स्वच्छ जल, स्वच्छ वातावरण और प्रकृति का संरक्षण मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। छठ के अवसर पर घाटों की सफाई, प्लास्टिक मुक्त वातावरण और जल स्रोतों की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
सामाजिक एकता और लोक संस्कृति का उत्सव
छठ महापर्व सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है। इसमें जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर लोग एक साथ घाटों पर पूजा करते हैं। परिवारों के बीच सहयोग, पड़ोसियों के बीच सद्भाव और समाज में आपसी सम्मान की भावना मजबूत होती है।
छठ के पारंपरिक गीतों में मां की ममता, परिवार की खुशहाली, संतान की मंगलकामना और सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा का भाव झलकता है। यही गीत इस महापर्व की सांस्कृतिक आत्मा हैं।
निष्कर्ष
चार दिवसीय छठ महापर्व हमें आस्था के साथ-साथ अनुशासन, स्वच्छता, त्याग, सेवा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें परिवार का सुख, समाज का कल्याण और प्रकृति का सम्मान एक साथ जुड़ते हैं।
छठ केवल सूर्य की उपासना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, सामूहिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का उत्सव है।
आइए, इस लोक आस्था के महापर्व पर स्वच्छ घाट, स्वच्छ जल और स्वच्छ समाज का संकल्प लें तथा श्रद्धा, सद्भाव और भक्ति के साथ छठी मैया एवं भगवान सूर्य की आराधना करें।
जय छठी मैया! जय सूर्यदेव!
