बथनाहा थाना में एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज SC/ST एक्ट से संबंधित मामले को अररिया की विशेष अदालत द्वारा खारिज किए जाने के बाद पुलिस की कार्रवाई और प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। न्यायालय द्वारा पुलिस की फाइनल रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद मामले ने कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर नई चर्चा को जन्म दिया है।
अररिया: बथनाहा थाना क्षेत्र के एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामले को अररिया की प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश सह विशेष SC/ST न्यायालय ने खारिज कर दिया है। न्यायालय ने अनुसंधान अधिकारी द्वारा प्रस्तुत फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए मामले का निष्पादन कर दिया।
मामला बथनाहा थाना कांड संख्या 104/2024 तथा विशेष SC/ST केस संख्या 50/2025 से संबंधित था। शिकायतकर्ता ने पत्रकार साधन यादव पर नौकरी दिलाने के नाम पर रुपये लेने, पैसे मांगने पर जातिसूचक शब्द कहने तथा जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया था। शिकायत के आधार पर बथनाहा थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई और अनुसंधान की जिम्मेदारी संबंधित जांच अधिकारी को सौंपी गई।
पुलिस जांच के दौरान अनुसंधान अधिकारी ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान तथा अन्य तथ्यों का परीक्षण किया। जांच के बाद पुलिस ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि नहीं होने की बात कही और न्यायालय को मामले में अंतिम प्रतिवेदन सौंपा।
प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने शिकायतकर्ता को कई अवसर प्रदान किए। न्यायालय के अभिलेख के अनुसार 29 मई 2025 को सर्विस रिपोर्ट संलग्न की गई। इसके बाद 30 जून 2025 को शिकायतकर्ता को पुलिस की फाइनल रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराने का अंतिम अवसर दिया गया। निर्धारित तिथि पर भी शिकायतकर्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ।
25 अगस्त 2025 को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों और अनुसंधान अधिकारी की फाइनल रिपोर्ट पर विचार करते हुए आदेश पारित किया कि बार-बार बुलाए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता उपस्थित नहीं हुआ। इसके बाद न्यायालय ने फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करते हुए मामले को खारिज कर दिया।
न्यायालय के आदेश के बाद इस मामले को लेकर पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई पर भी सवाल उठने लगे हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि जांच के बाद आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो प्राथमिकी दर्ज करने के बाद अपनाई गई कार्रवाई और पूरी प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक है। यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि मामले में जांच पूरी होने से पहले आरोपी के विरुद्ध की गई कार्रवाई किस आधार पर की गई थी।
दूसरी ओर, पत्रकार का कहना है कि मामले के दौरान उन्हें और उनके परिवार को मानसिक तथा सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनका आरोप है कि कई बार पुलिस द्वारा उनके घर पर छापेमारी की गई, जिससे परिवार पर भी दबाव बना। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इस प्रकरण के बाद स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि मामले की प्रशासनिक समीक्षा कर यह देखा जाए कि प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर अनुसंधान तक की प्रक्रिया विधिसम्मत तरीके से अपनाई गई थी या नहीं। साथ ही, यदि किसी स्तर पर लापरवाही या प्रक्रिया संबंधी त्रुटि पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।