नरपतगंज के भंगही पंचायत (वार्ड-12) की जमीनी हकीकत; 20 वर्षों से पक्की सड़क को तरस रही आदिवासी बस्ती, मासूमों ने पूछा- “पढ़ेंगे नहीं तो बड़े आदमी कैसे बनेंगे?”
नरपतगंज (अररिया): जहां एक तरफ देश डिजिटल इंडिया और चमचमाती सड़कों का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ अररिया जिले के नरपतगंज प्रखंड अंतर्गत भंगही पंचायत के वार्ड नंबर-12 स्थित आदिवासी बस्ती आज भी आदिम युग की पीड़ा झेलने को मजबूर है। विकास के दावों की पोल खोलती इस बस्ती में चारों तरफ घुटनों तक गाद, लबालब भरा गंदा पानी और बदबूदार कीचड़ पसरा हुआ है। स्थिति यह है कि पिछले 20 वर्षों से यहाँ के ग्रामीण एक अदद पक्की सड़क के लिए तरस रहे हैं।
*नौनिहालों का संघर्ष: शिक्षा की राह बनी अग्निपरीक्षा*
इस भीषण दुर्दशा के बीच सबसे दर्दनाक पहलू यहाँ के बच्चों की शिक्षा है। स्थानीय सोनापुर स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे और बच्चियों के लिए हर दिन का सफर किसी चुनौती से कम नहीं होता। स्थानीय छात्राओं (सृष्टि कुमारी और दसवीं कक्षा की बबिता कुमारी) ने रोष और बेबसी प्रकट करते हुए बताया कि उन्हें स्कूल जाने के लिए हर दिन इसी दलदल से होकर गुजरना पड़ता है।
छात्राओं का कहना है, “एक हाथ में स्कूल का भारी बैग होता है और दूसरे हाथ में चप्पलें उठानी पड़ती हैं। बारिश के दिनों में तो स्कूल जाना ही छूट जाता है। लेकिन हम क्या करें? पढ़ेंगे नहीं तो बड़े आदमी कैसे बनेंगे?” इन मासूमों के चेहरे पर व्यवस्था के खिलाफ गहरी शिकायत साफ नजर आती है।
*नेताओं के वादों की बलि चढ़ी 20 साल की उम्मीदें*
आदिवासी बस्ती के बुजुर्ग, नौजवान, महिलाएं और पुरुष सभी इस नारकीय स्थिति से बेहद व्याकुल और परेशान हैं। ग्रामीणों का फूटा गुस्सा साफ बयां करता है कि उनका राजनीतिक तंत्र से भरोसा उठ चुका है।
*स्थानीय ग्रामीणों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:*
“हम लोग गरीब और मजदूर हैं। बेबस और निस्सहाय हैं, इसलिए हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं है। हम जाएं तो जाएं कहां? जब भी चुनाव आता है, तो बड़े-बड़े नेता और अभिनेता कुछ रसूखदार जमींदारों और पूंजीपतियों को साथ लेकर हमारी बस्ती में वोट मांगने आ जाते हैं। उस वक्त बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, भरोसे दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सब गायब हो जाते हैं।”
ग्रामीणों के अनुसार, वे पिछले लगभग 20-22 वर्षों से यहाँ बसे हुए हैं, लेकिन आज तक विकास का एक कतरा भी यहाँ नहीं पहुंचा। यहाँ तक कि क्षेत्र की विधायिका या अन्य जनप्रतिनिधि भी केवल चुनाव के वक्त ही अपना चेहरा दिखाते हैं और फिर अगले पांच साल के लिए लापता हो जाते हैं
*प्रशासनिक उदासीनता पर उठते तीखे सवाल*
यह स्थिति उस पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का दम भरती है। जो बच्चे देश का भविष्य हैं, वे आज स्कूल जाने के लिए कीचड़ में चप्पलें हाथ में लेकर चलने को मजबूर हैं।
इस विकट समस्या को लेकर क्षेत्र की जनता में भारी आक्रोश है और अब देखना यह है कि इस खबर के बाद जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कुंभकर्णी नींद टूटती है या भंगही पंचायत के इस आदिवासी समाज को अगले चुनाव तक फिर से केवल झूठे वादों के सहारे ही नारकीय जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा।