मुफ्त सुविधाओं के बावजूद सरकारी स्कूलों से दूरी, अधिकारियों और शिक्षकों की पसंद ने खड़े किए गंभीर प्रश्न
अररिया : देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा, किताबें, ड्रेस और भोजन जैसी सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद अभिभावकों का झुकाव तेजी से प्राइवेट स्कूलों की ओर बढ़ रहा है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब सरकारी नौकरी में कार्यरत अधिकारी और शिक्षक खुद अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में सोशल मीडिया पर एक अधिकारी का इंटरव्यू सामने आया, जिसमें वह प्राइवेट स्कूलों की जमकर तारीफ करते नजर आए। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ही सरकारी स्कूलों पर भरोसा नहीं करते, तो आम जनता का विश्वास कैसे कायम होगा।
सरकारी स्कूलों की स्थिति पर सवाल
सरकारी स्कूलों में फीस, ड्रेस, किताबें और मध्याह्न भोजन जैसी सुविधाएं पूरी तरह मुफ्त दी जाती हैं। इसके बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि यदि जिला स्तर के अधिकारी और शिक्षा विभाग के पदाधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजें, तो इससे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की संभावना बढ़ सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जवाबदेही की कमी और निगरानी तंत्र की कमजोर स्थिति सरकारी स्कूलों की गिरती छवि का मुख्य कारण है। कई जगहों पर शिक्षकों की नियमित उपस्थिति, पढ़ाई का स्तर और संसाधनों का सही उपयोग अब भी चुनौती बना हुआ है।
प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता दबदबा
दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों में ऊंची फीस, महंगी किताबें और ड्रेस के बावजूद अभिभावक अपने बच्चों का नामांकन कराने को मजबूर हैं। एक अनुमान के मुताबिक, प्राइवेट स्कूल में एक छात्र पर सालाना 50 हजार से लेकर 1.7 लाख रुपये तक का खर्च आता है। इसमें मासिक फीस, एडमिशन चार्ज, किताबें और अन्य खर्च शामिल हैं।
वहीं, प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की सैलरी 5 हजार से 30 हजार रुपये तक होती है, जबकि सरकारी शिक्षकों को 20 हजार से 70 हजार रुपये तक वेतन मिलता है। इसके बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में प्राइवेट स्कूल आगे माने जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस दोहरी व्यवस्था ने समाज में असमानता को बढ़ा दिया है। एक ओर गरीब तबका सरकारी स्कूलों पर निर्भर है, वहीं मध्यम और उच्च वर्ग प्राइवेट स्कूलों की ओर रुख कर रहा है।
भ्रष्टाचार से जोड़कर देख रहे लोग
कुछ अभिभावकों का आरोप है कि प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस और खर्च का दबाव अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। उनका कहना है कि महंगी शिक्षा का खर्च उठाने के लिए लोग गलत रास्तों का सहारा लेने को मजबूर हो रहे हैं।
हालांकि, शिक्षा के अधिकार के तहत हर अभिभावक को अपने बच्चे के लिए बेहतर विकल्प चुनने का अधिकार है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में ठोस सुधार नहीं होगा, तब तक यह असमानता बनी रहेगी।