लेखक: प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
कुर्सी का नशा सबसे खतरनाक नशा माना जाता है। जब सत्ता सेवा का माध्यम बनने के बजाय निजी स्वार्थ का साधन बन जाए, तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ने लगती है। किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा संकट वह नेतृत्व होता है, जो राष्ट्रहित से अधिक व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता दे। इसलिए हर नागरिक की यही कामना होनी चाहिए कि देश को ऐसा नेतृत्व मिले जो ईमानदारी, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो।
एक स्वार्थी नेता समाज को जोड़ने के बजाय उसे जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विभाजित करने का प्रयास करता है। चुनाव के समय धार्मिक स्थलों पर जाकर आस्था का प्रदर्शन करना और चुनाव समाप्त होते ही जनता की समस्याओं को भूल जाना लोकतांत्रिक राजनीति की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। ऐसी राजनीति का उद्देश्य विकास नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्त करना होता है।
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है—सत्य और जवाबदेही। लेकिन जब झूठ को प्रचार के माध्यम से सच की तरह प्रस्तुत किया जाने लगे, तब जनता के सामने वास्तविक समस्याएं धुंधली पड़ जाती हैं। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे गंभीर विषयों पर ठोस समाधान देने के बजाय बहाने बनाए जाएं, तो जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। किसी भी सरकार की सफलता का पैमाना उसके भाषण नहीं, बल्कि उसके कार्य और परिणाम होते हैं।
लोकतंत्र संस्थाओं की मजबूती पर चलता है। यदि संविधान, न्यायपालिका, मीडिया और अन्य संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष न रहें, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। मीडिया का दायित्व सत्ता से प्रश्न पूछना है, न कि केवल उसकी प्रशंसा करना। इसी प्रकार नागरिकों का अधिकार है कि वे सरकार से जवाब मांगें। सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है, देशद्रोह नहीं।
किसान, जवान, महिला, युवा और गरीब केवल चुनावी नारों के पात्र नहीं हैं। उनकी समस्याओं का समाधान नीतियों और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से होना चाहिए। यदि विकास केवल विज्ञापनों और उद्घाटनों तक सीमित रह जाए, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाएं उपेक्षित रहें, तो विकास का दावा अधूरा माना जाएगा।
एक सशक्त राष्ट्र वही होता है जहां शिक्षा मजबूत हो, स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हों, रोजगार के अवसर बढ़ें और नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सकें। पढ़ा-लिखा और जागरूक समाज ही लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। इसलिए किसी भी सरकार की प्राथमिकता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पारदर्शी प्रशासन होनी चाहिए।
भारतीय परंपरा में आदर्श शासन की कल्पना “रामराज्य” के रूप में की गई है, जहां शासक स्वयं को जनता का सेवक मानता है। लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, शासक नहीं। जनता उन्हें अधिकार इसलिए देती है ताकि वे संविधान के अनुरूप शासन करें और प्रत्येक नागरिक के प्रति समान उत्तरदायित्व निभाएं।
चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है। यह केवल सरकार चुनने का अवसर नहीं, बल्कि देश की दिशा तय करने का भी अवसर है। इसलिए मतदाताओं को जाति, धर्म, भावनात्मक नारों या प्रचार से ऊपर उठकर उम्मीदवार के कार्य, ईमानदारी, जवाबदेही और जनसेवा के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
देश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो समाज को जोड़े, संस्थाओं का सम्मान करे, संविधान की भावना के अनुरूप कार्य करे और जनता के प्रति जवाबदेह रहे। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक हैं। यदि मतदाता विवेकपूर्ण निर्णय लेंगे, तो देश का भविष्य भी अधिक मजबूत, समावेशी और लोकतांत्रिक होगा।