प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी का पर्व मनाया जाता है, इस पर्व को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है l हर वर्ष यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और पूरा परिवार भी बासी भोजन करता है, जिसको एक दिन पहले ही बनाकर रख लिया जाता है. यह पर्व मुख्यत: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजारत आदि उत्तरी राज्यों में मनाया जाता है lधार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता की पूजा अर्चना करने से सभी रोग व कष्ट दूर होते हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं शीतला सप्तमी का पूजा मुहूर्त, विधि और महत्व।
शीतला सप्तमी की तिथि:
शीतला सप्तमी को यह व्रत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है।
इस वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि की शुरुआत 09 मार्च को रात 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर शीतला सप्तमी 10 मार्च 2026 को मनाई जायेगी l इस दिन भक्त देवी माँ शीतला की पूजा अर्चना करते हैं, और परिवार के प्रति सुख स्वास्थ्य की कामना करते हैं l
शीतला अष्टमी में शुभ मुहूर्त
शीतला सप्तमी के अगले दिन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी मनाई जाती है l
चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 10 मार्च को सुबह 4 बजकर 24 मिनट पर शुरू होकर 06.26 बजे तक हैं l
शीतला अष्टमी को बसौड़ा मनाया जाएगा। इस दिन माता को बसौड़ा का भोग लगाया जाता है और विशेष पूजा की जाती है।
शीतला सप्तमी शुभ योग:
इस बार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर कई मंगलकारी योग बन रहे हैं। इस दिन हर्षण योग का प्रभाव सुबह 08.21 बजे तक रहेगा l
इस योग में मां शीतला की पूजा करने से शुभ कामों में सफलता एवं सिद्धि मिलती है।
रवि योग- शीतला सप्तमी पर रवि योग का भी संयोग है l इस योग में मां शीतला की साधना करने से आरोग्य जीवन का वरदान मिलता है।ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इन शुभ योगो में देवी माँ शीतला की पूजा करने से जीवन में सुख- समृद्धि और आरोग्यता का आशीर्वाद मिलता हैं l
शीतला सप्तमी की पूजा विधि:
•प्रात: काल उठकर व्रत का संकल्प करें और स्नान आदि के बाद पूजा की तैयारी करें।
•चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर शीतला माता की मूर्ति या छवि स्थापित करें।
•माता शीतला को जल चढ़ाएं। उसके बाद हल्दी पाउडर, चंदन, सिंदूर, या कुमकुम से सजाएं.
•माता शीतला को लाल रंग के फूल अर्पित करें।
•धूप-दीप जलाएं। श्रीफल और चने की दाल चढ़ाएं l आरती के साथ पूजा करें।
माता शीतला को प्रणाम करें।
शीतला अष्टमी को बसौड़े का भोग:
शीतला सप्तमी के अगले दिन शीतला अष्टमी के दिन देवी को बसौड़े का भोग लगाया जाता है।
यह भोग सप्तमी को तैयार किया जाता है।भोग के लिए गुड़ चावल या गन्ने के रस और चावल की खीर तैयार की जाती है।अष्टमी के दिन उसी खीर का भोग देवी को लगाया जाता है।शीतला अष्टमी को ताजा भोजन बनाने की मनाही होती है और प्रसाद के रूप में सभी खीर ग्रहण करते हैं।
बासी भोजन का लगता है माता को भोग:
शीतला सप्तमी के दिन घर में ताजा भोजन नहीं पकाया जाता, माता के भोग के साथ साथ पूरे परिवार के लिए एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख लिया जाता है क्योंकि इस दिन घर का चूल्हा ना जलने की परंपरा है। फिर दूसरे दिन सूर्य निकलने से पहले शीतला माता का पूजन किया जाता है और घर के सभी सदस्य बासी भोजन करते हैं. घर के सदस्यों को ताजी भोजन बसौड़ा के अगले दिन ही मिलता है।हालांकि जिस घर में चेचक से कोई बीमार सदस्य है, उस घर में यह व्रत नहीं करना चाहिए। शीतला सप्तमी का पर्व शीत ऋतु के अंत और ग्रीष्मकाल के प्रारंभ होने का भी प्रतीक है।
शीतला सप्तमी का महत्व:
शीतला माता का व्रत और पूजा अर्चना करने से परिवार के सदस्य सभी तरह के रोगों से दूर रहते हैं और धन-धान्य और सौभाग्य में वृद्धि होती है. इस पर्व को बसौड़ा या बसोड़ा के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है बासी भोजन।शीतला माता को इस दिन बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और माता आशीर्वाद के रूप में सभी तरह के तापों का नाश करती हैं और भक्त के तन और मन को शीतल करती हैं. शीतला माता की पूजा करने से चेचक, खसरा, ज्वर आदि रोगों से दूर रखती हैं।